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गढ़वा जेल में एक नई शुरूआत की दस्तक

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Garhwa(Nityanand Dubey) : “जहां दीवारें ऊंची हों, वहां उम्मीद की रौशनी और ऊंचाई से उतरती है।” रविवार को गढ़वा जिला कारा में ऐसा ही एक दृश्य सामने आया, जब बंदीगृह की ऊंची दीवारों के भीतर न्याय, स्वास्थ्य और आत्मज्ञान ने कदम रखा। जेल अदालत, विधिक जागरूकता और स्वास्थ्य शिविर लगाया गया। प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश नलिन कुमार (अध्यक्ष, DLSA) की देखरेख में जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (डालसा) के बैनर तले ये सबकुछ हुआ। SDO संजय कुमार ने कहा कि “जेल में आकर इंसान गुनहगार नहीं बन जाता। यहां से लौटते वक्त अगर सोच बदले, तो वही जीवन की सबसे बड़ी सजा और सबसे बड़ा सुधार होता है।” उन्होंने प्ली-बार्गेनिंग, भारतीय संविधान में प्रदत्त बंदियों के मौलिक अधिकार और समाज में दोबारा लौटने के रास्तों पर विस्तार से चर्चा की।

कानून अब दूर नहीं, साथ है

LADC प्रविंद कुमार व नित्यानंद दुबे ने साझा तौर पर बंदियों को उनके केस की स्थिति समझाई, वन अधिनियम, सुलहनीय वाद और प्ली बार्गेनिंग की प्रक्रिया को सरल भाषा में बताया। आधी सजा काट चुके कैदियों को राहत पाने की राह दिखाई। बंदियों से व्यक्तिगत रूप से संवाद कर उनकी समस्याएं सुनीं और समाधान का आश्वासन दिया स्वास्थ्यकर्मियों व पीएलवी तृप्ता भानू ने बंदियों की स्वास्थ्य जांच की, उन्हें मुफ्त में दवाईयां दी। मानसिक और शारीरिक दोनों समस्याओं पर खुलकर बात की।

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