KohramLive : आतंक, नक्सल, चुनावी ड्यूटी, आपदा, वीआईपी सिक्योरिटी और अन्य मोर्चों पर दुश्मनों को शिकस्त देने वाले केंद्रीय अर्धसैनिक बल खासकर CRPF जवानों को लेकर सामने आई खबरें चौंका कर रख दी है। इस साल दो इंस्पेक्टर, एक ASI और 10 जवानों ने सुसाइड कर ली। इनमें से एक इंस्पेक्टर की बॉडी पंखे से झूलती हुई मिली तो दूसरे ने अपनी राइफल से खुद को गोली मार ली। ASI ने फांसी के फंदे पर झूलकर अपनी जान दे दी। गुजरे पांच साल में CRPF के करीब 240 जवान आत्महत्या कर चुके हैं। वहीं BSF के 174, CISF के 89, SSB के 164 एवं ITBP के 51, असम राइफल के 43 और NSG के 3 जवानों ने सुसाइड कर ली। यहां सबसे चौंकाने वाली बातें यह है कि बीते पांच साल में केंद्रीय सुरक्षा बल के 50 हजार 155 जवानों ने अपनी नौकरी छोड़ दी।
12 अगस्त को पुलवामा में 112 बटालियन के जवान अजय कुमार ने आत्महत्या कर ली थी। वे झारखंड के रहने वाले थे। 15 अगस्त को असम 20 बटालियन के इंस्पेक्टर चित्तरंजन बारो ने अपना जीवन खत्म कर लिया। वे मूल रूप के असम के ही कामरूप के रहने वाले थे। 17 अगस्त को सिपाही राहुल कश्यप ने ग्रुप सेंटर जीएनआर में अपना जीवन खत्म कर लिया। वे यूपी के रहने वाले थे। 19 अगस्त को छत्तीसगढ़ स्थित 210 कोबरा में इंस्पेक्टर शफी अख्तर ने अपनी राइफल से खुद को गोली मार ली थी। वे मूलत: दिल्ली के रहने वाले थे। 19 अगस्त को सिपाही जगदीश प्रसाद मीणा ने आत्महत्या कर ली थी। यह घटना झारखंड स्थित 158 बटालियन में हुई। वे राजस्थान के रहने वाले थे। 25 अगस्त को ओडिशा स्थित बल की 127 वीं बटालियन में हवलदार रमेश सी. लाल ने अपना जीवन खत्म कर लिया। वे केरल के रहने वाले थे। एक सितंबर को ग्रुप सेंटर काठगोदाम में SI नरेश कुमार ने सुसाइड कर ली। वे यूपी के रहने वाले थे। 2 सितंबर को जम्मू कश्मीर स्थित सी/4 बटालियन के हवलदार विशिष्ट नारायण यादव ने खुदकुशी कर ली। वे बिहार के रहने वाले थे। दो सितंबर को श्रीनगर स्थित 54वीं बटालियन के सिपाही संजय कुमार ने अपना जीवन समाप्त कर लिया। वे दिल्ली के रहने वाले थे। 4 सितंबर को भोपाल स्थित डी/107 बटालियन के सिपाही मोगली सुधाकर ने खुदकुशी कर ली। वे तेलंगाना के रहने वाले थे।
देश के सबसे बड़े मीडिया समूह में शुमार ”अमर उजाला” में छपी खबर के अनुसार गुजरे पांच साल में केंद्रीय सुरक्षा बल के करीब 654 जवानों ने खुदकुशी कर ली। केंद्रीय अर्धसैनिक बलों CRPF, ITBP, BSF, SSB, CISF, असम असम राइफल्स और राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड में जवानों व अधिकारियों द्वारा आत्महत्या करने के मामले कम नहीं हो पा रहे हैं। गत पांच वर्ष में केंद्रीय अर्धसैनिक बलों के 654 से अधिक जवानों ने आत्महत्या कर ली है। बजट सत्र के दौरान गृह मंत्रालय की संसदीय समिति ने अपनी 242 वीं रिपोर्ट में कहा था कि आत्महत्या के केस, बल की वर्किंग कंडीशन पर असर डालते हैं। सेवा नियमों में सुधार की गुंजाइश है। जवानों को प्रोत्साहन दें। रोटेशन पॉलिसी के तहत पोस्टिंग दी जाये। लंबे समय तक कठोर तैनाती न दें। ट्रांसफर पॉलिसी ऐसी बनाई जाए कि जवानों को अपनी पसंद का ड्यूटी स्थल मिल जाये। अगर ऐसे उपाय किए जाते हैं तो नौकरी छोड़कर जाने वालों की संख्या में कमी आ सकती है। इस तरह की घटनाओं पर गृह मंत्रालय और बल की तरफ से एक ही जवाब मिलता रहा है कि संबंधित जवान को किसी तरह की कोई पारिवारिक दिक्कतें रही होगी। आत्महत्या जैसी घटनाओं को रोकने के लिये जोखिम के प्रासंगिक घटकों एवं प्रासंगिक जोखिम समूहों की पहचान करने तथा उपचारात्मक उपायों से संबंधित सुझाव देने के लिए एक कार्यबल का गठन किया गया है। कार्यबल की रिपोर्ट तैयार हो रही है।
परेशानी को लेकर कभी बात नहीं होती
मीडिया रिपोर्ट में कॉन्फेडरेशन ऑफ एक्स पैरामिलिट्री फोर्स मार्टियर्स वेलफेयर एसोसिएशन के हवाले से कहा गया है कि जवानों को घर की परेशानी नहीं है। इन्हें ड्यूटी पर क्या परेशानी है, इस बारे में सरकार कोई बात नहीं करती। एक कंपनी में जवानों की तय संख्या कभी भी पूरी नहीं रहती। मुश्किल से साठ सत्तर जवान ही ड्यूटी पर रहते हैं। ऐसे में उनके ड्यूटी के घंटे बढ़ जाते हैं। जवान ठीक से सो नहीं पाते हैं। वे अपनी समस्या किसी के सामने रखते हैं, तो वहां ठीक तरह से सुनवाई नहीं हो पाती। ये बातें जवानों को तनाव की ओर ले जाती हैं। कुछ स्थानों पर बैरक एवं दूसरी सुविधाओं की कमी नजर आती है। कई दफा सीनियर की डांट फटकार भी जवान को आत्महत्या तक ले जाती है। नतीजा, जवान टेंशन में रहने लगते हैं।
काउंसलिंग से लेकर दूसरे उपाय भी बेअसर
सूत्रों का कहना है कि बल में हो रही आत्महत्याओं को लेकर शासन-प्रशासन गंभीर नहीं है। जवान अपने परिवार से दूर रहते हैं। वहां पर अगर उन्हें निजी कष्ट भी है तो वे उसके लिए किसके साथ बातचीत करेंगे। बल में ही किसी से कहेंगे। वहां पर उन्हें डांट कर भगा दिया जाता है। आत्महत्या के केस न बढ़ें, इसके लिए फाइलों में कई तरह की योजनाएं चलती हैं। हालांकि इसके बाद भी नतीजा सिफर है। जवानों की बात ठीक तरह से सुनी नहीं जाती। दुख बताने या जताने पर डांट फटकार सुननी पड़ती है। नतीजा, वह घुटन भरी जिंदगी जीने लगता है। जब सहने की शक्ति खत्म हो जाती है तो घातक परिणाम सामने आते हैं। प्यार से बात करने पर मन को बदला जा सकता है, मौत जैसे कठोर कदम से पीछे हट सकता है।
इसे भी पढ़ें : सभी का उत्थान और विकास सरकार का संकल्प : सीएम हेमंत










