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मेरी कब्र की पत्थर पर लिख देना हिन्दुस्तान, देखें क्यों

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Ranchi (Arti Gupta) : हौसला जरूरी है… पत्थरों के सीने चीरकर ही रास्ते निकलते हैं। भारतीय सेना महज एक नौकरी का पार्ट नहीं। शारीरिक और मानसिक रूप से मजबूत जिगरवाले ही तिरंगा की आन, बान, शान बनते हैं। मेरी सोच यह है कि पहली गोली मेरी नहीं होगी, पर बाद की गोलियों की गिनती भी नहीं करूंगा। यह कहना था जांबाज और न जाने कितनी शौर्य की गाथा लिखने वाले देश के पहले CDS बिपिन रावत का। गुजरे चार दशक से देश की सुरक्षा करने और अपने तिरंगे को बुलंद रखने वाले बिपिन के सीने पर कई अनमोल मेडल भी लगे। 16 मार्च 1958 को उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में जन्में बिपिन बचपन से ही साहसी और बहादुर थे। उनके पिता लक्ष्मण सिंह रावत सेना के लेफ्टिनेंट जनरल थे। बिपिन को जानने और पहचानने वाले बताते हैं कि डर उनसे कोसों दूर रहता था। वे कभी डरे नहीं। बचपन में ही झलक गया था कि कुछ अलग कर दिखा देने वालों की लिस्ट में इनका भी नाम सुशोभित रहेगा। पढ़ाई-लिखाई के बाद साल 1978 में सेना की 11वीं गोरखा राइफल की 5वीं बटालियन से अपना करियर शुरू किया। अपनी उम्दा सोच और रणनीति और कभी हार ना मानने वाले बिपिन जल, थल और वायू के CDS बना दिये गये। इससे पहले भी वे शीर्ष पदों पर रहे। पत्नी मधुलिका रावत हमेशा उनकी ताकत बनी रही।

साल 1987 में सुमदोरोंग चू घाटी में भारतीय सैनिकों और चीनी सेना की बीच भिड़ंत हो गई थी, इस भिड़ंत में भारतीय सेना की ओर से बिपिन रावत की बटालियन ने मोर्चा संभाला था। 1962 के भारत-चीन युद्ध के बाद दोनों देशों के सैनिकों के बीच 25 साल बाद यह पहली भिड़ंत थी।

सर्जिकल स्ट्राइक में अपनी एक अलग पहचान बना गये और हर दिल अजीज इंसान के रूप में उनका चेहरा उभर कर सामने आया। जून 2015 में मणिपुर में यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ वेस्टर्न साउथ ईस्ट एशिया के उग्रवादियों के घात लगाकर किए गए हमले में भारतीय सेना के 18 जवान शहीद हो गए थे। उसके बाद सेना के 21वें पैराशूट बटालियन के जवानों ने म्यांमार की सीमा में घुसकर आतंकियों पर सर्जिकल स्ट्राइक की थी।

वतन की खातिर कुछ भी कर गुजरने की तमन्ना ही उनकी आखिरी ख्वाहिश थी। चाहे दुश्मन कोई हो, जब किसी ने भी आंखे तरेरी तो उन्हें तगड़ा जवाब देने के लिए जाने जाते थे। बुधवार की सुबह एक हेलिकॉप्टर क्रैश में उनका देहांत हो गया।  उनके साथ उनकी पत्नी और 12 अन्य अधिकारी भी थे। वे अपने पीछे दो बेटी कृतिका और तारिणी को छोड़ गये हैं। बिपिन के बारे में सिर्फ इतना कहा जा सकता है…. “किसका मकबरा है, दुनिया वाले जान जायेंगे। मेरी कब्र के पत्थर पर हिंदुस्तान लिख देना।”

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