Kohramlive : बीस बरस पहले बोई गई एक भूल, अब जाकर दूर हुई। वो दौर 2005 का था, देश बदल रहा था, लेकिन सिस्टम में एक ऐसी चूक दर्ज हो गई थी, जो आने वाले वर्षों तक किसी ने नहीं देखी, किसी ने नहीं समझी। मतदाता पहचान पत्र यानी EPIC नंबरों की दुनिया में एक सन्नाटा छुपा था, एक जैसी संख्याएं, मगर अलग-अलग चेहरे। कहते हैं, कई बार सिस्टम की चुप गलती इंसानों की आवाज से बड़ी होती है। देश के अलग-अलग कोनों में, गांव की पगडंडियों से लेकर महानगरों की गलियों तक एक जैसे EPIC नंबर उन मतदाताओं को दिये गये, जो न तो एक-दूसरे को जानते थे, न ही एक ही जगह के बाशिंदे थे। वजह? 2005 से ईआरओ द्वारा जारी की गई पुरानी अल्फ़ान्यूमेरिक श्रृंखला, जो सीमांकन के बाद भी जारी रही। 2024 की दस्तक के साथ, भारत निर्वाचन आयोग ने उठाया यह बीस साल पुराना पिटारा।
और फिर शुरू हुआ खोज का महायज्ञ
- देश के 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में।
- 4123 विधानसभा क्षेत्रों में।
- 10.50 लाख मतदान केन्द्रों पर।
- 99 करोड़ से भी ज़्यादा मतदाताओं का डेटाबेस छाना गया…
ECI के अधिकारियों ने इस डिजिटल भूलभुलैया से बाहर निकाल लिया सच्चे मतदाताओं का वजूद। जहां-जहां दो लोगों के पास एक जैसे EPIC नंबर थे, लेकिन वे अलग विधानसभा क्षेत्र के थे, उन्हें नये नंबर देकर फिर से पहचान दी गई।
मतलब, न कोई हक छीना गया, न कोई मतदाता भूला गया। और हां, इस तकनीकी भूल का किसी चुनाव पर कोई असर नहीं पड़ा, हर वोट, अपनी जगह पड़ा और गिना गया। इस बीच रांची की एक बुजुर्ग ने कहा कि “बिटवा, हम तो समझे थे मशीन की गलती होई, अब जान के चैन मिला कि जो वोट हमने डाला, वो बेकार ना गया।” इस फैसले ने न सिर्फ एक पुरानी गलती को सुधारा, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि सिस्टम जब चाहे, खुद को साफ कर सकता है और जनता का विश्वास फिर से जीत सकता है।






