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ना पत्ते हिले, ना हवा चली… क्योंकि गुरुजी नहीं रहे

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Ranchi : आज सुबह जब नींद से उठकर बालकनी में आया और आसमान की ओर नजर डाली, तो कुछ अजीब था। ना धूप थी, ना हवा की कोई सरगोशी, ना ही पेड़ों की पत्तियां हिल रही थीं।सब कुछ थमा-थमा सा था, जैसे प्रकृति खुद किसी गहरे सोच में डूबी हो। पक्षी भी चुप थे, और सुबह की ताजगी कहीं खो सी गई थी। पहली बार लगा मौसम उदास है। दिल ने अजीब सा संदेह जताया क्या झारखंड में कुछ घटने वाला है? क्या कोई अनहोनी…? अभी ये सवाल मन में पूरी तरह उतरा भी नहीं था कि मोबाइल की स्क्रीन पर एक सूचना चमकी “गुरुजी हमें छोड़कर चले गये…” CM हेमंत सोरेन का पोस्ट था।

आंखों में अचानक कुछ धुंधलका उतर आया। शायद यह खबर नहीं थी, एक युग के अंत की सूचना थी। शिबू सोरेन, आदिवासी चेतना के प्रहरी, झारखंड आंदोलन के सेनापति, झारखंड की आत्मा अब हमारे बीच नहीं रहे। जिस मिट्टी से उन्होंने जन आंदोलन की लौ जलाई, जिस आवाज़ से उन्होंने संसद तक आदिवासी दर्द पहुंचाया वो आज खामोश हो गई।

CM हेमंत सोरेन के एक पोस्ट ने मन को झकझोर दिया “आज मैं शून्य हो गया हूँ…”उस एक वाक्य में न केवल बेटे का दुख था, बल्कि पूरे झारखंड की वेदना छिपी थी। गुरुजी का जाना कोई एक व्यक्ति का जाना नहीं, यह उस विचार का विलीन होना है, जो ज़मीन, जंगल और जनता को जोड़ता था। मौसम अब भी शांत है, लेकिन अब समझ आ गया वह खामोशी क्यों थी। आज झारखंड रो रहा है, और साथ में आसमान भी।

 झारखंड की आत्मा, आदिवासी अस्मिता की आवाज़ और जनआंदोलनों की धड़कन शिबू सोरेन अब हमारे बीच नहीं रहे। 81 की उम्र में ‘गुरुजी’ ने आज सुबह दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल में अंतिम सांस ली। वे लंबे समय से किडनी, हृदय और डायबिटीज संबंधी बीमारियों से पीड़ित थे और पिछले कई हफ्तों से वेंटिलेटर पर थे।

एक साधारण किसान परिवार से निकलकर झारखंड मुक्ति मोर्चा की नींव रखने वाले शिबू सोरेन का जीवन संघर्ष, आंदोलन और जनप्रतिनिधित्व का जीवंत प्रतीक रहा। उन्होंने न केवल झारखंड राज्य के निर्माण का सपना देखा, बल्कि उसे साकार भी किया। उनके निधन के साथ ही झारखंड की राजनीति में एक युग का अंत हो गया। राज्य सरकार ने आज से 3 दिन राजकीय शोक का ऐलान किया है। वहीं सभी सरकारी दफ्तर आज और कल बंद रहेंगे।

शिबू सोरेन का जीवन वर्णन 

झारखंड की राजनीति में अगर किसी नाम की गूंज सबसे पहले सुनाई देती है, तो वो है दिशाेम गुरु शिबू सोरेन। आदिवासी समाज की आवाज़, जंगल और ज़मीन की लड़ाई का प्रतीक, और ‘गुरुजी’ के नाम से मशहूर इस नेता की ज़िंदगी किसी आंदोलन से कम नहीं रही।

1934 में झारखंड के दुमका ज़िले में जन्मे शिबू सोरेन, बचपन से ही गरीबी और शोषण की आग में तपे। उनके पिता की हत्या ज़मींदारों ने कर दी थी, क्योंकि वे आदिवासियों के हक के लिए खड़े हो गये थे। यही वो पल था, जिसने शिबू को सिर्फ इंसान नहीं, आंदोलन बना दिया।उन्होंने संथाल परगना के जंगलों से आवाज़ उठाई “यह ज़मीन हमारी है।”

1970 के दशक में ‘संथाल हुुल’ की भावना को फिर से जीवित करते हुये उन्होंने ‘झारखंड मुक्ति मोर्चा’ (JMM) की नींव रखी। यह सिर्फ एक राजनीतिक पार्टी नहीं, बल्कि झारखंड राज्य की मांग का जनांदोलन था।

शिबू सोरेन का जीवन सड़क से संसद तक का सफर है। वे तीन बार केंद्रीय मंत्री बने, लेकिन विवादों ने भी उनका पीछा नहीं छोड़ा। 2004 में जब वे रेल मंत्री बने और फिर जेल गये, तो कई लोगों ने सोचा कि अब उनका राजनीतिक सफर थम जायेगा। लेकिन गुरुजी तो राजनीति की मिट्टी से बने थे, हर बार गिरकर उठे और और मजबूत हुये। 2005 में उन्होंने झारखंड के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली, लेकिन यह कार्यकाल बहुत छोटा रहा। उनके जीवन का बड़ा लक्ष्य था झारखंड को सिर्फ राज्य का दर्जा नहीं, उसकी आत्मा को पहचान दिलाना।

शिबू सोरेन की राजनीति नारेबाज़ी से नहीं, जनसंघर्ष की धूल से उपजी थी। वे आज भी झारखंड की राजनीति के सबसे प्रभावशाली चेहरों में से एक हैं। अब उनकी विरासत उनके बेटे हेमंत सोरेन के हाथों है जो अब झारखंड के CM पद पर हैं। शिबू सोरेन अब सिर्फ एक नाम नहीं, एक विचारधारा बन चुके हैं जो आने वाले वर्षों तक झारखंड की राजनीति और चेतना को दिशा देती रहेगी।

 

 

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