Ranchi : गरीबी की कोख में पले-बढ़े अतीक अहमद 10वीं क्लास में फेल कर गया। वो तालिम हासिल करने की राह से भटक गलत लोगों की संगत में चला गया। तब उसके पास कुछ नहीं, सिर्फ जिगर था। वो किसी से डरता नहीं था। रातों-रात अमीर बनने की चाहत में अपराध के दलदल में अतीक धंसता चला गया। उसके पिता फिरोज अहमद तांगा चलाकर परिवार चलाते थे। यूपी के कई थानों के रजिस्ट्ररों में उसका नाम अंकित होता चला गया। कई संगीन जुर्म में नाम उछलने के बाद अतीक अहमद बड़ा गुंडा चांद बाबा से सीधी अदावत लेकर बड़ा पंगा ले लिया। तब चांद बाबा के नाम का पूरे इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में बड़ा खौफ था। पुलिस, पब्लिक और राजनेता हर कोई चांद बाबा से आजिज थे।
छोटे-बड़े हस्तियों से मिलने लगी थी ताकत
अतीक अहमद ने मौका का फायदा उठाया और चांद बाबा के खिलाफ खड़ा हो गया। इस वजह से अतीक अहमद को कई छोटे-बड़े हस्तियों से ताकत मिलने लगी। एक जमाना ऐसा आया कि अतीक अहमद बड़ा माफिया बन गया। उसकी हुकूमत चलने लगी। 1997 में उस पर हत्या का पहला मुकदमा दर्ज हुआ। उसके कई राजनीतिक आका हो गये। बड़े-बड़े राजनीतिक चेहरों का अतीक अहमद दुलारा बन गया। इससे पहले साल 1986 में पुलिस ने अतीक को गिरफ्तार कर लिया। एक राजनीतिक आका के फोन पर वह जेल से छूट गया। उसका कद बढ़ता चला गया। अंडरवर्ल्ड में चांद बाबा से भी बड़ा नाम उसका हो गया। एक बड़े राजनेता की शह पर अतीक अहमद की गुंडई ने सत्ता के गलियारे में कोहराम मचा दी।
बीच चौराहे पर दिनदहाड़े चांद बाबा का कर दिया गया खून
जेल से छूटने के बाद अतीक ने साल 1989 में राजनीति में कदम रखा। इलाहाबाद शहर पश्चिमी सीट से विधानसभा चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। यहां उसका सीधा मुकाबला चांद बाबा से था। दोनों के बीच गैंगवार शुरू हो गया। अतीक का खौफ इतना हो गया था कि उसके नाम से पूरा इलाहाबाद कांपता था। इसी की बदौलत वह चुनाव भी जीत गया। इसके कुछ महीनों बाद ही बीच चौराहे पर दिनदहाड़े चांद बाबा का खून कर दिया गया। चांद बाबा के मारे जाने के बाद माफिया अतीक एक ऐसा खौफनाक चेहरा बनकर उभरा कि वो जिस किसी पर अपना अंगुली रख देता, वह उसका हो जाता। चाहे वो घर हो, जमीन हो या फिर कुछ और…। उसकी बादशाहत बरकरार रही।
आतंक का दूसरा नाम बन चुका था अतीक
चांद बाबा के मारे जाने के बाद अपराध की दुनिया में Ateek Ahmed का सिक्का चलने लगा। साल 1991 और 1993 में भी अतीक निर्दलीय चुनाव जीता। साल 1996 में सपा के टिकट पर विधायक बना। साल 1999 में अपना दल के टिकट पर प्रतापगढ़ से चुनाव लड़ा और हार गया। फिर 2002 में अपनी पुरानी इलाहाबाद पश्चिमी सीट से पांचवीं बार विधायक बना। आतंक का दूसरा नाम Ateek बन चुका था। उसका खौफ इतना हो गया था कि कोई उसके खिलाफ चुनाव लड़ने से भी डरता था। साल 2004 के लोकसभा चुनाव में अतीक अहमद सपा के टिकट पर इलाहाबाद की फूलपुर सीट से चुनाव जीत गया। उस वक्त Ateek Ahmed इलाहाबाद पश्चिम सीट से विधायक था। इस सीट से अब वह अपने छोटे भाई अशरफ को चुनाव लड़ाने की तैयारी करने लगा।
2002 में राजू पाल ने कर ली राजनीति में एंट्री
कभी जिगरी दोस्त रहे राजू पाल ने 2002 में राजनीति में एंट्री कर ली। इसके बाद दोनों एक दूसरे के जानी दुश्मन हो गये। साल 2004 में जब Ateek Ahmed फूलपुर से सांसद बन गया तो इलाहाबाद शहर पश्चिमी सीट से उसके छोटे भाई अशरफ ने चुनाव लड़ा। अशरफ के खिलाफ बसपा ने राजू पाल को टिकट दे दिया। राजू पाल इस चुनाव में जीत गये। MLA बनने के तीन महीने बाद यानी 15 जनवरी 2005 में राजू पाल ने पूजा पाल से शादी कर ली। शादी के ठीक 10 दिन बाद यानी 25 जनवरी 2005 को राजू पाल का मर्डर हो गया। इस हत्याकांड में अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ का नाम उछलकर सामने आया।
राजू पाल की पत्नी पूजा पाल ने अतीक को हराया था
2012 के विधानसभा चुनाव भी Ateek ने चुनाव लड़ा, लेकिन हार गया। उसे राजू पाल की पत्नी पूजा पाल ने हरा दिया था। मायावती की सरकार आते ही अतीक के बुरे दिन शुरू हो गये। वहीं योगी के सीएम बनते ही अतीक के खिलाफ कई मामलों की जांच शुरू हो गई। इसके बाद से लेकर अब तक Ateek की 1600 करोड़ रुपए से ज्यादा की गैर कानूनी संपत्तियों पर बुलडोजर चल चुका है। अतीक का भाई अशरफ भी मरियाडीह डबल मर्डर मामले में जेल में बंद था। अतीक के चार बेटे हैं। एक बेटे असद को पुलिस ने उमेश पाल हत्याकांड में एनकाउंटर में मार गिराया। बीते 15 अप्रैल को प्रयागराज के जिला अस्पताल के बाहर तीन शूटरों ने अतीक और उसके भाई अशरफ को गोलियों से भून डाला। इस बहुचर्चित हत्याकांड के पीछे छुपे कई राज का अभी सामने आना बाकी है।
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