Kohramlive : बांग्लादेश में आज दोपहर की वह घड़ी कुछ अलग थी। सूरज ढाका के आसमान में चमक रहा था और माइलस्टोन स्कूल-कॉलेज के गलियारों में बच्चे जीवन की पाठशाला में डूबे थे। कोई गणित सुलझा रहा था, कोई विज्ञान की परिभाषाओं से लड़ रहा था। लेकिन किसी को क्या पता था कि नियति उनके लिए एक भयानक अध्याय लिख चुकी है। हवा में गरजती एक धातु की चिड़िया यानी बांग्लादेश वायुसेना का F-7 प्रशिक्षण विमान अचानक दिशा खो बैठा। पंख झुलस गये, संतुलन डगमगाया और अगले ही पल एक विस्फोट के साथ वह स्कूल परिसर में आ गिरा। आग की लपटें उठीं, धुएं का गुबार फैला और मासूम चीखों ने आसमान को चीर दिया।” कॉलेज की इमारत से टकराते ही विमान की आवाज़ ने पूरे इलाके को हिला दिया। शोर, चीखें, भागदौड़ और फिर खून से सनी किताबें, पिघली कुर्सियां, और जलती उम्मीदें।
मौत की परछाई और 100 जख्मी सपने
खबर लिखे जाने तक इस हादसे में एक युवक की जान चली गई, जबकि 100 से ज़्यादा छात्र और नागरिक घायल हो गये। कुछ बुरी तरह झुलस गये, कुछ की हड्डियां टूटीं, तो कुछ सिर्फ डर के मारे बोल नहीं पा रहे थे। अस्पताल की ओर भागती एम्बुलेंसों में सिर्फ जख्म नहीं थे, उसमें मां की पुकार, पिता की दहाड़ और बच्चों की सिसकियां थीं। 60 गंभीर घायलों को बर्न इंस्टीट्यूट रेफर किया गया, जबकि कई का इलाज उत्तरा मेडिकल कॉलेज में हुआ। एक महिला शिक्षिका जलती हालत में बच्चों को बचाने की कोशिश करती रही।
सेना के जवानों की बहादुरी
बचाव कार्य में बांग्लादेश सेना, अग्निशमन सेवा और नागरिक सुरक्षा के जवान अपनी जान हथेली पर लेकर कूद पड़े। वे एक-एक छात्र को अपनी बाहों में लेकर बाहर ला रहे थे। किसी की कंधे पर किताब थी, तो किसी की गोद में जलता बैग।
मासूमियत पर बरसी तबाही, लेकिन…
स्कूल के गलियारे अब खाली हैं। बोर्ड पर अधूरी परिभाषाएं हैं, बेंचों पर राख है और दीवारों पर डर की परछाई। लेकिन इन सबके बीच भी एक उम्मीद बाकी है वो छात्र जो अब भी जिंदा हैं, वो शिक्षक जिन्होंने अपने ज़ख्मों को भुलाकर दूसरों को बचाया।






