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पितरों की कृपा का खास दिन, भाद्रपद अमावस्या आज…

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Kohramlive : हिंदू धर्म में अमावस्या सिर्फ चांद के दिखाई न देने की तिथि नहीं, बल्कि पूर्वजों को याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता जताने का भी अवसर मानी जाती है। भाद्रपद मास की अमावस्या को भी पितरों के निमित्त तर्पण, श्राद्ध और दान-पुण्य के लिये विशेष माना गया है। इस वर्ष भाद्रपद अमावस्या आज यानी 11 सितंबर से मनाई जायेगी। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन श्रद्धा से किये गये तर्पण, दान और सेवा से पितरों का आशीर्वाद प्राप्त होता है। हिंदू परंपरा में पूर्वज परिवार की वंश परंपरा की महत्वपूर्ण कड़ी माने जाते हैं। इसलिये अमावस्या पर उनका स्मरण केवल पितृ दोष से राहत पाने का उपाय नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा भी है। मान्यता है कि पितरों की कृपा से परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और सकारात्मकता बनी रहती है।

सुबह स्नान, फिर पितरों का स्मरण

भाद्रपद अमावस्या के दिन सूर्योदय से पहले या सुबह स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें। इसके बाद शांत मन से अपने पूर्वजों का स्मरण करें। परंपरा के अनुसार पितरों के निमित्त जल अर्पित कर तर्पण किया जाता है। तर्पण करते समय श्रद्धा और भाव को सबसे महत्वपूर्ण माना गया है। इस दिन अपनी सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र और उपयोगी वस्तुओं का दान किया जा सकता है। जरूरतमंद लोगों को भोजन कराना भी पुण्यकारी माना गया है। पारंपरिक मान्यताओं में गाय, कौआ, कुत्ते और अन्य जीवों के लिए भोजन निकालना भी पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का एक तरीका माना गया है।

पितृ दोष से भी जोड़ी जाती है अमावस्या

ज्योतिषीय मान्यताओं में कुंडली में सूर्य, राहु, केतु आदि ग्रहों की कुछ विशेष स्थितियों से बनने वाले योगों को पितृ दोष से जोड़ा जाता है। धार्मिक परंपराओं में इसे पूर्वजों के प्रति कर्तव्यों में कमी या तर्पण-श्राद्ध न किए जाने जैसी मान्यताओं से भी जोड़ा जाता है। मान्यता है कि पितृ दोष के कारण जीवन में बार-बार रुकावट, आर्थिक परेशानी, पारिवारिक तनाव, करियर में बाधा या संतान से जुड़ी चिंता जैसी स्थितियां आ सकती हैं। हालांकि, ये धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताएं हैं; इन्हें वैज्ञानिक रूप से स्थापित तथ्य नहीं माना जाता।

पितृ दोष से राहत के लिये कर सकते हैं ये उपाय

  • स्नान के बाद पितरों का ध्यान कर जल, काले तिल और कुश से तर्पण करें।
  • श्रद्धापूर्वक ‘ॐ पितृभ्यः नमः’ मंत्र का जाप कर सकते हैं।
  • जाने-अनजाने हुई भूल के लिये मन ही मन पूर्वजों से क्षमा मांगें।
  • जरूरतमंदों को अपनी क्षमता के अनुसार भोजन, अन्न या वस्त्र दान करें।
  • जीव-जंतुओं के लिये भोजन निकालें।
  • दिनभर क्रोध, झूठ, अपमान और किसी को जानबूझकर कष्ट देने से बचें।

दिखावा नहीं, श्रद्धा है सबसे जरूरी

भाद्रपद अमावस्या पर धार्मिक कार्य करते समय सबसे जरूरी है श्रद्धा और सामर्थ्य। महंगे आयोजन या दिखावे से ज्यादा महत्व सच्ची भावना का माना जाता है। इसलिये इस अमावस्या पर अपने पूर्वजों को याद करें, उनके प्रति कृतज्ञता जतायें और अपनी क्षमता के अनुसार किसी जरूरतमंद की मदद करें। क्योंकि परंपरा का सार यही है, पूर्वजों को याद करना, जरूरतमंद का हाथ थामना और अपने भीतर के अंधेरे में श्रद्धा का एक दीप जलाना।

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