Ranchi : कैबिनेट से मंजूरी के बाद लंबे समय से सार्वजनिक किये जाने की मांग झेल रही पेसा (PESA) नियमावली को लेकर अब तस्वीर साफ होती दिख रही है। राज्य सरकार के पंचायती राज विभाग के सचिव के हस्ताक्षर से 2 जनवरी को इस संबंध में औपचारिक अधिसूचना जारी कर दी गई है। इसके साथ ही अनुसूचित क्षेत्रों में स्वशासन को लेकर वर्षों से चली आ रही प्रतीक्षा पर विराम लग गया है।
17 अध्याय, 20 पन्ने और 8 आवेदन प्रारूप
करीब 20 पृष्ठों की इस अधिसूचना में 17 अध्यायों के तहत पेसा नियमावली के प्रावधानों को विस्तार से रखा गया है। इसके अतिरिक्त विभाग ने 8 पृष्ठों के विभिन्न आवेदन प्रारूप भी जारी किये हैं, ताकि ग्राम सभा के कामकाज को सरल और व्यवस्थित बनाया जा सके। सरकार का दावा है कि यह नियमावली अनुसूचित क्षेत्रों के संरक्षण और विकास की दिशा में एक ठोस कदम है। पेसा नियमावली के अनुसार ग्राम सभा का अध्यक्ष वही व्यक्ति होगा, जिसे संबंधित समुदाय की परंपरागत रीति-रिवाजों के अनुसार मान्यता प्राप्त हो। जैसे, संथाल समुदाय मांझी/परगना, हो समुदाय मुंडा/मानकी/दिउरी, खड़िया समुदाय डोकलो सोहोर, मुंडा समुदाय हातू मुंडा/पड़हा बेल (राजा)/पहान, भूमिज समुदाय: मुड़ा/सरदार/नाया/डाकुआ, ग्राम सभा का सचिव पंचायत सचिव होगा, जबकि सहायक सचिव ग्राम सभा द्वारा चुना गया पंचायत सहायक या अन्य सदस्य होगा। पारंपरिक ग्राम सभाओं और उनकी सीमाओं की मान्यता व प्रशासन की जिम्मेदारी उपायुक्त को सौंपी गई है। इसके लिए उपायुक्त द्वारा प्रखंड स्तर पर एक टीम गठित की जायेगी। हर पारंपरिक ग्राम सभा को राजस्व ग्राम के समान दर्जा दिया गया है, जिसकी पहचान उपायुक्त की टीम पारंपरिक ग्राम सभा के प्रधान और सदस्यों के साथ मिलकर करेगी।

हर महीने बैठक, महिलाओं की अनिवार्य भागीदारी
नियमावली के मुताबिक ग्राम सभा की बैठक कम से कम महीने में एक बार होगी। कुल सदस्यों के 1/10 या 50 सदस्यों (जो कम हो) की लिखित मांग पर या ग्राम प्रधान, मुखिया, पंचायत समिति, जिला परिषद, जिला दंडाधिकारी अथवा उपायुक्त के निर्देश पर 7 दिनों के भीतर विशेष बैठक बुलाई जा सकती है। बैठक के लिए कोरम अनिवार्य होगा। कुल सदस्यों का एक तिहाई और इसमें भी एक तिहाई महिला सदस्यों की उपस्थिति अनिवार्य होगी। ग्राम सभा की बैठक की अध्यक्षता अध्यक्ष द्वारा की जायेगी। ग्राम सभा के निर्णयों के आलोक में ग्राम पंचायत यथासंभव कार्य करेगी। सरकारी योजनाओं एवं चयनित लाभुकों से जुड़ी योजनाओं के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी ग्राम पंचायत की कार्यकारिणी समिति की होगी। पेसा नियमावली के तहत ग्राम सभा को छोटे-मोटे अपराधों में दोषी को दंडित करने का भी अधिकार दिया गया है। इसके अलावा ग्राम सभा भयमुक्त व शांत वातावरण बनाए रखने, नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और आत्मसम्मान की रक्षा, महिलाओं, वृद्धों और बच्चों के साथ दुर्व्यवहार रोकने, सार्वजनिक स्थानों पर झगड़ों और असामाजिक गतिविधियों पर नियंत्रण, पारंपरिक रीति-रिवाजों के अनुसार विवाद निपटारे जैसे कार्यों के लिए सक्षम होगी। यदि ग्राम सभा को यह प्रतीत होता है कि कोई नियम जनजातीय सामाजिक, धार्मिक या पारंपरिक प्रथाओं के अनुरूप नहीं है, तो वह प्रस्ताव पारित कर उपायुक्त को भेजेगी। उपायुक्त इसे राज्य सरकार को अग्रसारित करेंगे। राज्य सरकार को 30 दिनों के भीतर उच्च स्तरीय समिति गठित करनी होगी, जो 90 दिनों में अपनी सलाह देगी और 160 दिनों के भीतर निर्णय से ग्राम सभा को अवगत कराया जायेगा। इधऱ, पेसा नियमावली सार्वजनिक होते ही सियासत भी गरमा गई है। भाजपा के कुछ नेताओं ने सरकार पर तीखा हमला बोलते हुये इसे आदिवासी समाज के साथ छल करार दिया है। पूर्व मंत्री अमर कुमार बाउरी ने मीडिया को बताया कि सरकार ने पेसा कानून की मूल भावना को कमजोर कर दिया है। उनका कहना है कि जनजातीय परंपराओं की स्पष्ट परिभाषा नहीं की गई, वन उपज, खनिज और जल स्रोतों पर ग्राम सभा को वास्तविक नियंत्रण नहीं मिला, कई अहम अधिकार सरकार और जिला प्रशासन ने अपने पास ही रखे। भाजपा का दावा है कि यह कानून 1996 के मूल पेसा कानून की भावना के विपरीत है और ग्राम सभा को सशक्त करने के बजाय उसे सीमित करने का प्रयास किया गया है। पार्टी ने इसके खिलाफ पुरजोर विरोध का ऐलान किया है।




