Ranchi : बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश देने वाला दशहरा रांची में सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि दशकों पुरानी परंपरा और लोगों की भावनाओं से जुड़ा उत्सव है। हर साल जब रावण का पुतला आग की लपटों में समाता है, तो मैदान में गूंजता जय श्रीराम का जयघोष लोगों के मन में नई ऊर्जा भर देता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आज हजारों लोगों को अपनी ओर खींचने वाले इस शानदार आयोजन की शुरुआत महज 12 फीट के रावण के पुतले से हुई थी? रांची में रावण दहन की परंपरा वर्ष 1948 में शुरू हुई थी। उस समय रांची कॉलेज के पास महात्मा गांधी मार्ग स्थित डाकघर के सामने परिसर में 12 फीट ऊंचा रावण बनाया गया था। धीरे-धीरे यह आयोजन लोकप्रिय होता गया और समय के साथ इसकी भव्यता भी बढ़ती चली गई। आज मोरहाबादी मैदान में होने वाला रावण दहन शहर के प्रमुख आयोजनों में शामिल है।
डाकघर के सामने से मोरहाबादी मैदान तक का सफर
रावण दहन की शुरुआत के बाद आयोजन का स्थान और स्वरूप कई बार बदला। वर्ष 1950 से 1955 के बीच रेलवे स्टेशन के पास खजुरिया तालाब स्थित शरणार्थी शिविर में रावण के पुतलों का निर्माण किया जाने लगा। उस दौर में रावण दहन बारी पार्क में होता था, जिसे आज टाउन हॉल के आसपास के क्षेत्र के रूप में जाना जाता है। इसके बाद पंजाबी हिंदू बिरादरी के सदस्यों ने डोरंडा स्थित राम मंदिर में पुतलों का निर्माण शुरू कराया। जैसे-जैसे आयोजन में लोगों की भागीदारी और भीड़ बढ़ती गई, बड़े मैदान की जरूरत महसूस होने लगी। इसी क्रम में वर्ष 1960 से मोरहाबादी मैदान को रावण दहन के लिये चुना गया। फिर क्या था, छोटे से आयोजन ने धीरे-धीरे भव्य उत्सव का रूप ले लिया। पुतलों की ऊंचाई बढ़ी, तैयारियों का दायरा विस्तृत हुआ और रांचीवासियों के लिये दशहरे का यह आयोजन खास आकर्षण बन गया।
इस साल 70 फीट का रावण, 65 फीट का कुंभकर्ण
पंजाबी हिंदू बिरादरी के अध्यक्ष कुणाल अजमानी ने बताया कि इस वर्ष भी मोरहाबादी मैदान में रावण दहन को शानदार बनाने की तैयारी है। आयोजन में विशाल पुतलों के साथ सोने की लंका खास आकर्षण होगी। लगभग 70 फीट ऊंचा रावण होगा। 65 फीट ऊंचा कुंभकर्ण, 60 फीट ऊंचा मेघनाथ होगा, वहीं, 30×30 फीट की दो मंजिला संरचना सोने की लंका की झलक दिखाई देगी। इन विशाल पुतलों और लंका के निर्माण के साथ आयोजन को आकर्षक रूप देने की तैयारी की जा रही है। दशहरे के दिन मैदान में उमड़ने वाली भीड़ के बीच यह नजारा लोगों के लिये खास आकर्षण बनने की उम्मीद है। कुणाल अजमानी ने कहा कि करीब आठ दशक का यह सफर रांची के बदलते स्वरूप और लोगों की सांस्कृतिक विरासत की कहानी भी कहता है। कभी 12 फीट के पुतले से शुरू हुई परंपरा आज 70 फीट के रावण तक पहुंच चुकी है। पीढ़ियां बदलीं, शहर का विस्तार हुआ, लेकिन दशहरे पर बुराई के अंत और अच्छाई की जीत का संदेश आज भी कायम है।








