Kohramlive(Bhavna Thakur) : वो ठंडी हथेली जो तपते माथे पर रखी जाती है, वो झुकी निगाह जो रिपोर्टों से सच्चाई पढ़ लेती है और वो मुस्कान जो मरीज के डर को चुपचाप पी जाती है। वो कोई देवता नहीं, एक डॉक्टर होता है। 1 जुलाई साल का वो दिन जब हम उन देवदूतों को याद करते हैं, जो दवाइयों से ज्यादा उम्मीद देते हैं, जो सुई से ज्यादा सहनशीलता देते हैं और जो अपनी नींद, अपनी भूख, अपना घर, किसी अजनबी की सांसों के लिये कुर्बान कर देते हैं। तो वही डॉक्टर होता है, जो कहता है “मैं हूं, घबराइये मत…” उनके लिये ना कोई वंदनवार सजती है, ना कोई शंख बजते हैं, पर हर ठीक होते दिल की धड़कन में, उनके लिये एक ‘थैंक्स’ धड़कता है। “एक डॉक्टर वो है, जो अपने आंसुओं को कोट की जेब में छुपाकर, मरीज की आंखों में उम्मीद भरता है। वो रेत पर लकीर नहीं, जिंदगी की डगर पर दीपक रखते हैं, वो डॉक्टर होते हैं।” तो 1 जुलाई को अपना सर झुकाइये, एक मैसेज भेजिये या बस दिल से कहिये..“डॉक्टर साहब… शुक्रिया। आपने न जाने कितनी बार मौत से जंग जीतने में हमारी सांसों को हथियार दिया।”
धड़कनों का देवता
बरसात रात भर बरस रही थी, लालपुर के केसी रॉय मेमोरियल हॉस्पिटल के आंगन में टपकती बूंदें डॉक्टर बीएन बनर्जी की नींद पर हथौड़े की तरह गिर रही थीं। पूरे दिन की ड्यूटी के बाद वह बस चाय की एक घूंट लेने ही वाले थे कि नर्स का कॉल..“डॉक्टर साहब, एक केस आया है, बच्ची की सांसें उखड़ रही हैं।” डॉ बनर्जी चौंके। बिना समय गंवायें पहुंच गये हॉस्पिटल। इमरजेंसी वार्ड के एक कोने में मिट्टी से सनी एक मां, अपनी मासूम बेटी को गोद में लिये बैठी थी। बच्ची की आंखें आधी खुली थीं, होंठ नीले पड़ चुके थे।“नाम क्या है इसका?” डॉक्टर ने झुकते हुये पूछा। ”प्रिया…” उस मां की आवाज जैसे टूट रही थी, “गरीबी के कारण दवा छूट गई थी साहब, अब बचा लो मेरी बेटी को, भगवान के लिये…” डॉ बनर्जी के हाथ कांप गये, वो प्रिया की नब्ज टटोलने लगे। वह धीमी थी, बहुत धीमी।“ऑक्सीजन लगाओ!” उन्होंने चिल्लाया। “इनहेलर… इंजेक्शन तैयार करो… टाइम नहीं है।” डॉक्टर बनर्जी के लिये अब ये बच्ची सिर्फ एक केस नहीं थी, उनकी आंखों में अपनी गुजरी जिंदगी के टुकड़े झिलमिला उठे। एक-एक पल की लड़ाई थी, बाहर बिजली कड़क रही थी, अंदर एक नन्हीं जान के लिये देवदूत की तरह झुक कर एक डॉक्टर उसकी सांसों को वापस खींच लाने की जद्दोजहद में जुटे थे। कई मिनट बाद जब प्रिया ने पहली बार गहरी सांस ली और उसकी आंखें खुलीं, मां फूट-फूट कर रोने लगी।
“भगवान आपको खुश रखे साहब, आपने तो उसे नई जिंदगी दे दी…” डॉक्टर बीएन बनर्जी कुछ नहीं बोले। बस मुस्कुरा दिये। उन्होंने बच्ची के माथे पर हाथ रखा और धीमे से बोले, “बेटी, अब तुम दोबारा बीमार होकर मत आना..”यह कहानी हर उस डॉक्टर को समर्पित है, जो थके हुये कंधों और नम आंखों के बावजूद हर धड़कती सांस की रक्षा करते हैं।




