आखिरी तीर ने बदली कहानी
फाइनल मुकाबला शुरू से ही कांटे का रहा। पांच सेट के बाद दोनों तीरंदाज 5-5 की बराबरी पर पहुंच गये। सेटों में स्कोर इस तरह रहा..
- पहला सेट: 28-28
- दूसरा सेट: 28-29
- तीसरा सेट: 29-28
- चौथा सेट: 28-30
- पांचवां सेट: 28-27
अब फैसला शूट-ऑफ से होना था। तनाव चरम पर था और दोनों के हाथ में सिर्फ एक निर्णायक तीर था। शूट-ऑफ में धीरज ने सीधे 10 अंक के परफेक्ट निशाने पर तीर साध दिया। जापान के निशी जुन्या का तीर 9 अंक पर लगा। बस फिर क्या था, 6-5 से धीरज की ऐतिहासिक जीत पक्की हो गई। एक तीर ने मुकाबला भी जीता और भारतीय तीरंदाजी के इतिहास में नया पन्ना भी जोड़ दिया। विश्व रैंकिंग में 10वें स्थान पर काबिज 25 साल के धीरज का यह विश्व कप फाइनल में तीसरा प्रयास था और उन्होंने इस बार सीधे स्वर्ण पदक पर निशाना साध दिया। उनकी जीत ने भारतीय पुरुष तीरंदाजी के 16 साल के पदक सूखे को भी खत्म कर दिया। इससे पहले 2010 में एडिनबर्ग में टाटा स्टील के जयंत तालुकदार ने कांस्य पदक जीता था। लेकिन भारतीय पुरुष तीरंदाज इस प्रतियोगिता में स्वर्ण तक नहीं पहुंच सके थे। यहां याद दिला दें कि भारत का इससे पहले एकमात्र व्यक्तिगत स्वर्ण 2007 में डोला बनर्जी ने जीता था। वह टाटा तीरंदाजी अकादमी की पूर्व प्रशिक्षु भी रही हैं। वहीं, टाटा तीरंदाजी अकादमी की पूर्व प्रशिक्षु दीपिका कुमारी इस टूर्नामेंट में अब तक छह पदक जीत चुकी हैं, जिनमें पांच रजत और एक कांस्य शामिल है।






