Kohramlive : भारतीय रेलवे में हर दिन हजारों यात्री और मालगाड़ियां देश के अलग-अलग हिस्सों के बीच दौड़ती हैं। पैसेंजर ट्रेनें जहां लाखों यात्रियों को उनके गंतव्य तक पहुंचाती हैं, वहीं मालगाड़ियां देश की अर्थव्यवस्था के लिये जरूरी कोयला, अनाज, सीमेंट, स्टील और दूसरे सामान को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने में अहम भूमिका निभाती हैं। इन दोनों तरह की ट्रेनों को खींचने के लिये लोकोमोटिव यानी इंजन का इस्तेमाल होता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पैसेंजर और मालगाड़ी के लिये एक जैसा इंजन क्यों नहीं लगाया जाता? दरअसल, दोनों ट्रेनों की जरूरत अलग होती है और इसी हिसाब से लोकोमोटिव की क्षमता और संचालन प्राथमिकताएं तय की जाती हैं।
पैसेंजर ट्रेन के इंजन में क्या खास होता है?
यात्री ट्रेनों को अपने सफर के दौरान कई स्टेशनों पर रुकना पड़ता है। ऐसे में स्टेशन से निकलने के बाद ट्रेन को दोबारा गति पकड़नी होती है। यात्री सेवाओं में यात्रा का समय और निर्धारित गति महत्वपूर्ण परिचालन कारक होते हैं। इसलिये ऐसे लोकोमोटिव उपयोगी होते हैं जो ट्रेन को परिस्थितियों के अनुसार पर्याप्त तेजी से गति देने में सक्षम हों। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि पैसेंजर ट्रेन का इंजन केवल ज्यादा स्पीड के लिये बनाया जाता है। उसकी वास्तविक क्षमता कई चीजों पर निर्भर करती है, जैसे, ट्रेन का कुल वजन, कोचों की संख्या, रूट की स्थिति, चढ़ाई और ढलान, निर्धारित अधिकतम गति, ट्रैक और परिचालन परिस्थितियां यानी पैसेंजर ट्रेन के इंजन में गति के साथ पर्याप्त खींचने की क्षमता का संतुलन जरूरी होता है।
मालगाड़ी के इंजन की सबसे बड़ी ताकत क्या है?
अब बात आती है मालगाड़ी की। यहां तस्वीर पूरी तरह बदल जाती है। एक मालगाड़ी में बड़ी संख्या में वैगन जुड़े हो सकते हैं और उनका कुल वजन यात्री ट्रेन की तुलना में काफी ज्यादा हो सकता है। इतने भारी भार को खींचने के लिए इंजन में पर्याप्त ट्रैक्टिव एफर्ट यानी खींचने की क्षमता होना बेहद जरूरी है। खासकर चढ़ाई वाले रेल मार्गों पर भारी मालगाड़ी को आगे बढ़ाने के लिए लोकोमोटिव की खींचने की क्षमता महत्वपूर्ण हो जाती है। मालगाड़ी के संचालन में कई परिस्थितियों में बहुत अधिक गति हासिल करने की तुलना में भारी भार को लगातार, नियंत्रित और सुरक्षित तरीके से खींचना ज्यादा महत्वपूर्ण होता है।
आसान भाषा में समझिये पूरा अंतर
अगर इसे बेहद आसान उदाहरण से समझें तो पैसेंजर ट्रेन: कम समय में यात्रियों को निर्धारित गति से उनके गंतव्य तक पहुंचाना महत्वपूर्ण। मालगाड़ी: बहुत ज्यादा वजन को नियंत्रित तरीके से लंबी दूरी तक खींचना महत्वपूर्ण। यानी एक तरफ गति और परिचालन समय महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, तो दूसरी तरफ ट्रैक्टिव एफर्ट और भारी भार खींचने की क्षमता।
क्या हर पैसेंजर और मालगाड़ी का इंजन अलग होता है?
जरूरी नहीं। भारतीय रेलवे में लोकोमोटिव का इस्तेमाल केवल ट्रेन के प्रकार के आधार पर तय नहीं होता। रूट, ट्रेन का वजन, विद्युतीकरण, निर्धारित गति, ढलान और परिचालन जरूरतों जैसे कई कारक भी महत्वपूर्ण होते हैं। इसीलिये किसी इंजन को केवल “पैसेंजर इंजन” या “मालगाड़ी इंजन” कहकर उसकी पूरी क्षमता समझना सही नहीं होगा। रेलवे के इंजन बाहर से भले ही एक जैसे नजर आयें, लेकिन उनके डिजाइन और इस्तेमाल के पीछे काफी इंजीनियरिंग होती है। ट्रेन कितनी भारी है, उसे कितनी जल्दी गति पकड़नी है, रास्ते में कितनी चढ़ाई है और किस तरह का संचालन करना है, इन सभी बातों के हिसाब से लोकोमोटिव का चुनाव किया जाता है। यही वजह है कि यात्री और मालगाड़ी के लिये लोकोमोटिव का चुनाव उनकी अलग-अलग परिचालन जरूरतों के अनुसार किया जाता है।






